‘सिरमौर की तरह दक्षिण भारत में भी है माता रेणुका मंदिर’

माता और पुत्र के दिव्य मिलन का आलौकिक पर्व। सिरमौर का अंतरराष्ट्रीय श्री रेणुका मेला। आगामी 9 नवम्बर से 14 नवम्बर तक आयोजन किया जा रहा है।
लेकिन...! क्या आपको ज्ञात है। दक्षिण भारत के कुछ स्थलों और महाराष्ट्र में भी माता रेणुका के भव्य मंदिर स्थापित हैं। यहां तक की श्रीलंका में भी रेणुका मंदिर है। दक्षिण भारत में प्रचलित माता रेणुका की गाथा इस प्रकार हैः-
रेणुका राजा की पुत्री रेणुकाः- पौराणिक गाथा के अनुसार माता रेणुका, रेणुका राजा की दिव्य पुत्री थीं। माता रेणुका अग्नि से प्रकट हुई थीं। अगस्त्य मुनि ने जब माता रेणुका मात्र आठ वर्ष की थी तब रेणुका राजा को परामर्श दिया था। विवाह योग्य होने पर वह उनका विवाह रूचिक मुनि और सत्यावती के पुत्र ‘जमदग्नि ऋषि’ से करवाया जाए। निश्चित समय पर माता रेणुका का विवाह जमदग्नि ऋषि से संपन्न हुआ।
दिव्य जल पात्रः विवाह उपरांत माता रेणुका अपने पति जमदग्नि ऋषि के साथ रामश्रंग पवर्त पर रहने लगी। माता रेणुका अपने पति जमदग्निी ऋषि की ईश्वर अराधना और जप-तप कार्य में सदैव भागीदार रहती थी। वह ऋषि के लिए रोज पास बहती नदी से जल लाती थी। जल के लिए माता रेणुका ने अपनी दैवीय शक्ति से रेत के एक दिव्य ‘जलपात्र’ का निर्माण किया था। नदी तट से जल निकालने के लिए वह एक ‘सर्प’ को रस्सी की तरह इस्तेमाल करती थीं।
रामभद्र अर्थात भगवान परशुरामः- माता रेणुका और जमदग्नि ऋषि के चार पुत्र हुए। वासु, विश्वावासु, ब्रिहुदयानु, ब्रुतवाकनवा और रामभ्रद। रामभद्र सबसे छोटे पुत्र थे और शिव-पार्वती के अनन्य भक्त थे। यही रामभद्र बाद में परशुराम कहलाए। शिव से परशु नामक दिव्य अस्त्र प्राप्त करने के कारण रामभद्र का नाम परशुराम पड़ा। परशुराम, भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं।
गंधर्व के प्रति आकर्षित हुई माता रेणुकाः एक बार माता रेणुका नदी तट पर जल लेने के लिए गई। उन्होंने वहां पर कई गंधर्वों को जलक्रीड़ा करते हुए देखा। कुछ गंधर्व अपनी संगिनी संग निर्वस्त्र जलक्रीड़ा में मग्न थे। नियति द्वारा निर्धारित घटनाचक्र के फलस्परूप। रेणुका एक गंधर्व के प्रति आकर्षित हो र्गइं। मात्र एक क्षण के लिए उनका अपने पति जमदग्निी ऋषि से ध्यान हटा। दिव्य जलपात्र जल विलीन हो गया।
जमदग्नि ऋषि ने पुत्रों को भस्म कियाः- माता रेणुका आश्रम पहुंची। खाली हाथ लौटी माता से ऋषि अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने माता रेणुका को वहां से चले जाने के लिए कहा। ऋषि ने रूष्ट होकर अपने पुत्रों से कहा- अपनी माता का सर कलम करो...! तीनों पुत्रों ने ऐसा करने से मना कर दिया। क्रोधित ऋषि ने अपने दिव्य नेत्रों से अपने ही पुत्रों को भस्म कर दिया।
परशुराम ने काटा माता का सरः- तभी परशुराम वहां पहुंचे। उन्होंने देखा माता राख के ढेर के आगे विलाप कर रहीं थी। ऋषि ने परशुराम जी को सारा घटनाक्रम सुनाया। और उन्हंे माता का सर कलम करने के लिए कहा। परशुराम, ऋषि जमदग्नि की शक्तियों और उनके क्रोध से परिचित थे। अंततः उन्होंने अपने फरसे से माता का वध कर दिया।
इस पर ऋषि जमदग्नि प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने पुत्र परशुराम से कहा- पुत्र...! तुमने मेरे आदेश का पालन किया है। वर मांगो....! मैं उसे अवश्य पूरा करूंगा...! भगवान परशुराम ने अपने पिता के आगे हाथ जोड़कर प्रार्थना की-...हे ऋषिवर...! मेरी माता और मेरे अन्य भाइयों को जीवनदान दे दो...! ऋषि जमदग्नि ने अपन दिव्य शक्ति से उन्हें जीवन दान दे दिया...!