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‘भगवान परशुराम ने भूल से माता रेणुका का सर येलम्मा को लगाया’

दक्षिण भारत...! यहां प्रचचित गाथा अनुसार, जमदग्नि ऋषि ने भगवान परशुराम को आदेश दिया- 

‘जंगल में जाकर रेणुका का वध करो...!’
 भगवान परशुराम पितृ आज्ञा टाल नहीं सकते थे। परशुराम जब माता का वध करने के लिए उन्हें जंगल में लेकर गए। उसी समय एक निम्न जाति की येल्लम्मा नामक स्त्री ने। माता की दुर्दशा देखकर, परशुराम जी से उन्हें क्षमा करने की याचना की। वह स्त्री माता की रक्षा करने के लिए उनसे लिपट गई। भगवान परशुराम ने इस स्त्री को माता रेणुका से अलग करने का भरपूर प्रयास किया। किन्तु वे इसमें सफल नहीं हुए।
फिर...! भगवान परशुराम नेे पिता की आज्ञा का पालन किया। उन्होंने फरसे के तीव्र वार से अपनी माता के मस्तक को धड़ से अलग कर दिया। इसके साथ ही माता से लिपटी महिला का सर भी कट गया। 
पितृ आज्ञा का पालन करने के उपरांत। भगवान परशुराम अपने पिता जमदग्नि ऋषि के पास पहुंचे। प्रसन्नचित्त पिता ने परशुराम जी से वर मांगने के लिए कहा। 
कहते हैं भगवान परशुराम ने 6 वर मांगे...! 
पहला-माता को जीवनदान, दूसरा-भस्म हुए भाईयों को पुनः मानवीय शरीर में जीवित करना, तीसरा-किसी को भी इस घटना का स्मरण न रहे, चौथा-उन्हें मातृवध के पाप से मुक्त किया जाए, पांचवा-कोई भी उन्हें परास्त न कर सके और छठा-वह अजर अमर हों।  
पिता से वरदान पाकर। भगवान परशुराम वेग की गति से। अपनी मृत माता को जीवित करने वन में पहुंचे। यहीं भगवान परशुराम से भूल हो गई। माता को जीवित करने की जल्दबाजी और प्रसन्नता में। भगवान परशुराम ने माता रेणुका के शरीर में येल्लमा का मस्तक लगा दिया। 
जिस शरीर पर माता रेणुका का मस्तक लगाया गया उसे मरियम्मा और माता रेणुका के जिस शरीर पर येल्लमा का मस्तक लगाया। उसे कालांतर में येल्लम्मा के रूप में पूजा गया। 
दक्षिण भारत के आंध्रा, तेलंगाना और तामिलनाडू में निम्न जाति वर्ग में माता रेणुका- मरियम्मा और येल्लमा माता के रूप में पूजी जाती हैं। यहां वह एक शक्तिशाली देवी के रूप में पूजनीय है। 
महाराष्ट्र में प्रचलित गाथा के अनुसार। कर्तावीयार्जुन ने जमदग्नि ऋषि का वध किया। और माता रेणुका को बुरी तरह घायल कर दिया। भगवान परशुराम नेे कर्तावीयार्जुन से बदला लेने से पहले। अपने पिता के मृत शरीर का अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। उन्होंने महाराष्ट्र के सहयाद्रि ऋंखला के ‘मेहुर’ नामक स्थल को अंतिम संस्कार हेतु पवित्र पाया। 
रेणुका माता का सती होने का निर्णयः इसी बीच माता रेणुका ने सती होने का निर्णय लिया। वह अपने पति जमदग्निी ऋषि के वियोग में जलती चिता पर सती होने बैठ गई। माता ने भगवान परशुराम को वहां से जाने के लिए कह दिया। माता की आज्ञा पाकर भगवान परशुराम दुखी होकर वहां से चले गए। 
परंतु थोड़ी ही देर में। वह अपनी माता को बचाने के विचार से वापिस वहीं आ पहुंचे। किन्तु उन्होंने पाया कि माता का सारा शरीर जल चुका था। और मात्र उनका सर बचा हुआ था। मेहुर के इसी स्थल पर। माता रेणुका के ‘शीष’ की ‘देवी सती’ के रूप में पूजा की जाती है। यहां माता रेणुका का विशाल और भव्य मंदिर स्थापित है।  

 

(नोटः उपलब्ध जानकारी के अनुसार हमने इस आर्टिकल को तथ्यपरक बनाने का प्रयास किया है। यदि आपको इसमें किसी तथ्य] नाम] स्थल आदि के बारे में कोई सुधार वांछित लगता है तो info@mysirmaur.com पर अपना सुझाव भेंजे हम यथासंभव इसमें सुधार करेंगे)
 

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